क्रिया (Kriya) | क्रिया के भेद (Kriya ke Bhed)

क्रिया और क्रिया के भेद
kriya aur kriya ke bhed
[Kriya, क्रिया, Kriya ke bhed, क्रिया के भेद, Sakarmak Kriya aur Akarmak Kriya, सकर्मक क्रिया, अकर्मकक्रिया]

(1) क्रिया किसे कहते हैं ? (Kriya kise kahate hai)

उत्तर: क्रिया उसे कहते हैं ,जिन शब्दों से किसी काम के होने ,करने या किसी स्थिति का बोध हो ।

क्रिया किसी भी वाक्य को पूर्ण बनाती है ।इसलिए क्रिया वाक्य का अनिवार्य अंग है, बिना क्रिया के वाक्य रचना संभव नहीं है ।

जैसे: (Examples of Kriya)

सीता ‘गीत गाती’ है।

राम ‘पढ़़’ रहा है ।नदी ‘बह’ रही है।

महेश मन से पढ़ता है ,और परीक्षा पास करता है।

क्रियाएं अनायास हो रही है तथा “है ” में क्रिया की स्थिति का बोध होता है ।

(2) क्रिया के कितने भेद होते हैं ‌? (Kriya ke kitane bhed hote hai)

उत्तर: क्रिया के दो भेद होते हैं (kriya ke bhed) –सकर्मक क्रिया और अकर्मक क्रिया |

(क) सकर्मक क्रिया (Sakarmak kriya): जिस क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है। जिसके प्रयोग में कर्म की अनिवार्यता बनी रहती है। उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं।

दूसरे शब्दों में ,जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्ता से हो पर, जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु, अर्थात कर्म पर पड़े।

जैसे –विष्णु आम खाता है ।यहां ‘आम’ कर्म है ।क्रिया ‘खाता’ है का फल कर्म ‘आम’ पर पड़ा है। खाने के साथ उसका कृत रूप से संबंध है।  अतः खाना क्रिया सकर्मक है ।

(ख) अकर्मक क्रिया (Akarmak kriya): जिस क्रिया का फल कर्म पर नहीं  कर्ता पर पड़ता है, उसे  अकर्मक क्रिया कहते हैं ।

दूसरे शब्दों में , किसी कर्म की आवश्यकता अकर्मक क्रिया में नहीं होती है,  बल्कि क्रिया का व्यापार और फल दूसरे पर न पड़कर  कर्ता पर पड़ता है। 

जैसे –बालक सोता होता है ।बच्चा रोता है। इन वाक्यों में क्रिया करने वाला बालक और बच्चा जो कर्ता है । सोने और रोने की क्रिया उसी के द्वारा पूरी होती है। उसी पर क्रिया का सारा फल पड़  रहा है। अतः ‘सोना’, ‘रोना’ आदि  क्रियाएं अकर्मक है ।

(3) क्रिया के अन्य कितने भेद होते हैं ? (Sakarmak aur Akarmak kriya ke alawa kriya ke anya bhed kya hai?)

उत्तर: क्रिया के अन्य भेद इस प्रकार है: संयुक्त क्रिया, द्विकर्मक क्रिया, सहायक क्रिया, नामबोधक क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया , प्रेरणार्थक क्रिया ।

() संयुक्त क्रिया (Sanyukt kriya) : जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के योग से बनकर नया अर्थ देती है, यानी किसी एक ही क्रिया का काम करती हैं।  उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं ।  जैसे: मैंने खा लिया है । तुम अपना काम करना ।

संयुक्त क्रिया के भेद:

अर्थ के अनुसार संयुक्त क्रिया के मुख्य 11 भेद हैं:

(1) आरंभबोधक क्रिया (Aarambh bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया से क्रिया के आरंभ होने का बोध होता है ,उसे आरंभबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

जैसे —मेघ बरसने लगा ।धूप निकलने लगा । इसमें ‘ने’ क्रिया जोड़ी जाती है ।

(2) निश्चयबोधक क्रिया (Nishchay bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया के व्यापार की निश्चियता का बोध हो, उसे निश्चयबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

जैसे—रमेश एकाएक बोल उठा । बालक खेलते -खेलते गिर पड़ा ।

(3) शक्तिबोधक क्रिया (Shakti bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया से कार्य करने की शक्ति का बोध होता है, उसे शक्तिबोधक  संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

जैसे— रोगी अब चल फिर सकता है। माताश्री तीर्थ यात्रा जा सकती है । इसमें ‘सकना’ क्रिया जोड़ी जाती है ।

(4) इच्छाबोधक क्रिया (Ichchha bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया के करने की इच्छा प्रकट होती है ,उसे इच्छाबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं । 

जैसे —-मैं लिखना चाहता हूं ।मैं खाना चाहता हूं ।

(5) अवकाशबोधक क्रिया (Awakash bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में किसी कार्य को ठीक ढंग से पूरा करने के लिए अवकाश का बोध हो ,उसे अवकाशबोधक  संयुक्त क्रिया कहते हैं । 

जैसे —-भाई मुश्किल से सो पाया। अब उसे जाने भी दो ।

(6) नित्यताबोधक क्रिया (Nitya bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में किसी कार्य की नित्यता उसके बंद ना होने का भाव प्रकट हो, उसे नित्यताबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं  । मुख्य क्रिया के आगे ‘करना’, ‘रहना’ ,’आना’ जोड़ने से नित्यता बोधक क्रिया बनती है ।

जैसे— तुम रोज मंदिर जाया करना । भगवान की आरती किया करना।

(7) अनुमतिबोधक क्रिया (Anumati Bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में कार्य करने की अनुमति दिए जाने का बोध हो ,उसे  अनुमतिबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

जैसे—मुझे ‘मंदिर’ जाने दो ।मुझे ‘स्कूल’ जाने दो ।यह क्रिया ‘देन’ धातु के योग से बनती हैं ।

(8) आवश्यकताबोधक क्रिया (Awashyakata bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में कार्य की आवश्यकता या कर्तव्य का बोध हो ,उसे आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं ।

जैसे— मुझे घर का काम करना पड़ता है । तुम्हें स्कूल जाना चाहिए । साधारण क्रिया के साथ ‘पड़ना’  ‘होना’  ‘चाहिए’ क्रियाओं को जोड़ने से आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रियाएं बनती है ।

(9) अभ्यासबोधक क्रिया (Abhyash bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में करने के अभ्यास का बोध हो, उसे अभ्यासबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं  ।

जैसे—- राम पढ़ा करता है  ।मोहन लिखा करता है  ।छोटे-छोटे बच्चे खेला करते हैं ।इस क्रिया में ‘करना’ क्रिया लगाने से अभ्यासबोधक संयुक्त क्रियाएं बनती है ।

(10) पुनरुक्तबोधक क्रिया (Punarukt bodhak kriya): जिस संयुक्त क्रिया में जब दो समानार्थक अथवा समान ध्वनि वाली क्रियाओं का संयोग होता है ,तब उसे पुनरुक्त संयुक्त क्रिया कहते हैं।

जैसे—माताजी प्राय:  मंदिर आया- जाया करती है।  पिताजी अब ठीक से चलने- फिरने लगे हैं ।

(11) समाप्तिबोधक क्रिया (Samapti Bodhak Kriya): जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया की पूर्णता ,व्यापार की समाप्ति का बोध हो, उसे समाप्तिबोधक संयुक्त क्रिया कहते हैं  ।

जैसे —रमेश खा चुका है ।भाई भी यह दृश्य देख चुका हैं   ।धातु के आगे ‘चुकना’  जोड़ने से समाप्तिबोधक संयुक्त क्रियाएं बनती हैं ।

(ख) द्विकर्मक क्रिया (Dwikarmak kriya): द्विकर्मक क्रिया के अनुसार कुछ क्रियाएं एक कर्म वाली और दो कर्म वाली होती है ।

जैसे —राजा ने रोटी खाई ।इस वाक्य में कर्म एक ही है– ‘रोटी’ परंतु, ‘मैं विद्यार्थी को गीता का पाठ पढ़ाता हूं’, में दो कर्म है ‘विद्यार्थी को’ और ‘गीता’ ।

(ग) सहायक क्रिया (Sahayak kriya): जो क्रिया मुख्य क्रिया के रूप में एक क्रिया और कभी एक से अधिक क्रियाएं अर्थ को स्पष्ट और पूरा करने में सहायक होती है, उसे सहायक क्रिया कहते हैं । जैसे—वह खाता है । उसने पढ़ा था । तुम जगे हुए थे ।मैं सुन रहा था । इसमें खाना ,पढ़ना ,जगना, सुनना मुख्य क्रियाएं हैं, क्योंकि यहां क्रियाओं के अर्थ की प्रधानता है।

शेष क्रियाएं: जैसे— है, था, हुए थे, रहा था —सहायक क्रियाएं हैं । ये मुख्य क्रियाओं के अर्थ को स्पष्ट और पूरा करती हैं।

(घ) नामबोधक क्रिया (Nambodhak kriya): संज्ञा अथवा विशेषण के साथ क्रिया जोड़ने से जो संयुक्त क्रिया बनती है, उसे नामबोधक क्रिया कहते हैं ।

जैसे— दुखी होना, निराश होना । नामबोधक क्रिया संयुक्तक्रिया नहीं है ।संयुक्त क्रिया हैं दो क्रियाओं के योग से बनती है, और नामबोधक क्रियाएं संज्ञा अथवा विशेषण के मेल से बनती है ।

(ड़) पूर्वकालिक क्रिया (Purvakalik kriya): जब कोई कर्ता एक क्रिया समाप्त  करके दूसरी क्रिया करता है ,तब पहली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है ।

जैसे —राम ने पूजा करके भोजन किया । इसमें पूजा करना पूर्वकालिक क्रिया है ,क्योंकि इससे पूजा करने की क्रिया की समाप्ति के साथ ही भोजन करने की क्रिया का बोध होता है ।

(च) प्रेरणार्थक क्रिया (Preranarthak kriya): जिस क्रिया में करता स्वयं कार्य न कर किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है ,उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं ।

जैसे— करना से कराना । लिखना से लिखवाना आदि ।