IGNOU MHD Notes | MHD – 01 (हिंदी काव्य) | Part 1

IGNOU MHD 01 Notes

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MHD – 01 (हिंदी काव्य)

निम्नलिखित काव्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए ।

जाग पियारी अब का सोवै

रैन गई दिन काहे को खोवै II

जिन जागा तिन मानिक पाया

तैं बौरी सब सोय गँवाया II

पिय तेरे चतुर तू मूरख नारी

कबहुँ न पिया की सेज सँवारी II

तैं बौरी बौरापन किन्ही

भर-जोबन पिय अपन न चीन्ही II

जाग देख पिय सेज न तेरे

तोहि छाँड़ उठि गए सबेरे II

कहैं ‘कबीर’ सोई धुन जागै

शब्द-बान उर अंतर लागै II

प्रसंग :

प्रस्तुत  पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी काव्य – 1 के खंड दो से अवतरित हैं । इसके रचयिता निर्गुण भक्ति शाखा के सम्राट समाज सुधारक निर्भीकवर्ता  हिंदू – मुस्लिम एकता के समर्थक एवं भाषा के डिक्टेटर  संत कबीर दास जी हैं  ।

संदर्भ:

इस भजन में कबीर दास जी ने लोभ , क्रोध , मोह , तृष्णा में उलझे मानव को आगाह किया है कि यह मानव शरीर बड़े भाग्य से प्राप्त हुआ है । अत:  इसकी उपयोगिता ईश्वर की भक्ति में लगाकर जीवन मरण के बंधन से मुक्त होना है ना कि आमोद प्रमोद में इसे नष्ट करना है  ।

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व्याख्या :

” बड़े भाग्य मानुष तन पावा ।

सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा  ।। 

साधन – धाम मोक्ष कर द्वारा ।

पाइ  जे  परलोक संवारा ” ।। 

आत्मा को संबोधित करते हुए कबीरदास जी कहते हैं कि हे मनुष्य अब तो तुम सजग हो  जाओ । अब भी तुम आमोद  प्रमोद में क्यों खोए हुए हो । अब अज्ञानता और लोभ मोह रूपी निशा का  परित्याग करो ।

सोने और आमोद  प्रमोद में अपने जीवन को क्यों नष्ट कर रहे हो । जो जागता है उसका जीवन सार्थक हो जाता है । माया – मोह के बंधनों को छोड़कर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । ईश्वर सब गुणों से परिपूर्ण है । आत्मा अपूर्ण है , अज्ञान है , तभी तो उसने कभी ईश्वर के प्रति प्रेम भाव नहीं दर्शाया । 

हे मानव तूने अपने जीवन को व्यर्थ में या अज्ञानता में नष्ट कर दिया है । कभी भी ईश्वर के स्वरूप को समझा नहीं , उसके गुण को जाना नहीं निरंतर माया – मोह , भोग – विलास में डूबा रहा । माया – मोह को त्याग करो । अज्ञानता यानी माया – मोह को छोड़ो ।

आत्मिक ज्ञान के द्वारा ईश्वर के स्वरूप को जानो , तभी जीवन धन्य होगा । ईश्वर की शरण में जाने पर ही जीवन सार्थक होगा । इसीलिए माया – मोह , भोग – विलास , आमोद – प्रमोद पाखंड को त्यागो और ह्रदय में ईश्वर नाम को धारण करो , जिससे तुम्हारा जीवन सफल बने । 

“चल चकई तेंही सर विसय जह नहीं रही विक्षोह I

रहे एक टक दिवसई सूरहृदय हंस संदोह” II

विशेष :

(१) कबीर ने आत्मा और परमात्मा के वियोग और संयोग की स्थिति का वर्णन किया है ।

(२) मानव को भोग – विलास का त्याग कर अध्यात्म पद पर चलने का संदेश दिया है  ।

(३) सांसारिक जीवन को रात के रूप में चित्रित कर प्रकाश की ओर बढ़ने का परामर्श दिया है ।

भाषा शैली:

कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है । इसमें भोजपुरी , फारसी आदि शब्दों की बहुलता है । भाषा सरल एवंम अपने भाव को व्यक्त करने में समर्थ है ।

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