स्वनिम (लगभग 250 – 500 शब्दों में टिप्पणी लिखिए) | IGNOU MHD – 07 NOTES

IGNOU MHD – 07 NOTES

स्वनिम (लगभग 250 – 500 शब्दों में टिप्पणी लिखिए |)

उत्तर :  स्वनिम :

‘संरचनावादी संप्रदाय’ के सिद्धांतों तथा भाषा –  विश्लेषण की तकनीकों को अपनाकर ध्वनि –  संरचनाओं का अध्ययन जिस विज्ञान के अंतर्गत किया जाता रहा उसी विज्ञान को ‘स्वनिम विज्ञान’ की संज्ञा प्रदान की गई ।

भाषा में जब शब्दों का उच्चारण किया जाता है तो उनमे आने वाली ध्वनियों के उच्चारण में विभिन्न प्रकार के अंतर आ जाते हैं । कभी-कभी ये अंतर तब सुनाई देते हैं जब एक ही शब्द का उच्चारण विभिन्न भाषाएं और बोलिया बोलने वाले वक्ता अपनी -अपनी मातृभाषाओं के उच्चारण से प्रभावित होकर भिन्न – भिन्न रूप में करते हैं।

इसके अलावा शब्दारंभ, शब्द मध्य तथा शब्दांत में जब कोई एक ध्वनी आती है, तो अन्य निकटवर्ती ध्वनियों के प्रभाव से भी एक ही ध्वनि के उच्चारण में अंतर आ जाता है। कभी ध्वनियों के उच्चारण में अंतर तब दिखाई देता है जब किसी शब्द में अन्य ध्वनियाँ तो समान रहे पर किसी एक विशेष ध्वनी के स्थान पर कोई दूसरी ध्वनि आ जाती है तो भी उच्चारण में अंतर आ जाता है,  क्योंकि ध्वनियों के उच्चारण में आने  वाला अंतर विभिन्न ध्वनियों के परस्पर व्यतिरेक में आने के कारण आया है।

जो ध्वनिया समान वातावरण में परस्पर व्यतिरेक में आकर जब शब्द का अर्थ परिवर्तन कर देती है तो ऐसी ध्वनियों को ‘स्वनिम’ कहा जाता है। और किसी एक स्वनिम के उच्चारित रूपों को जो परीपूरक वितरण में आते हैं उसे ‘संस्बन’ कहते हैं। ‘परिपूरक वितरण’ से तत्पर्य उस स्थिति से है जहां एक वातावरण में किसी स्वनिम का एक उच्चारित रूप आता है तो दूसरे में दूसरा रूप ।  

‘स्वनिम – विज्ञान’ के अंतर्गत किसी भाषा के विभिन्न स्वनिमों तथा उनके संस्बनों का अध्यन किया जाता है । हिंदी में भी ‘ड’ स्वनिम के दो संस्वन मिलते हैं — (ड) तथा (ड़) शब्द के आरंभ में तथा व्यंजन गुच्छों में (ड) का उच्चारण किया जाता है तो शब्द मध्य में दो स्वरों के बीच शब्दांत में (ड़) का उच्चारण होता है जैसे :

ड :— डर, डलिया, डमरू, अड्डा, गुड्डा, बुड्ढ़ा ।

ड़ :— लड़का, घोड़ा, लकड़ी, जोड़ा, पेड़, मोड़़ ।

अतः निष्कर्ष के रूप में हम सकते हैं :—-

(A) परंपरागत स्वनिम विज्ञान में स्वनिम तथा संस्वन की अवधारणा से स्वनिमिक संरचना के दो स्तरों की संकल्पना होती :—

(i) एक तो उच्चारण का स्तर या वह स्तर जिसे परंपरागत रूप से ‘स्वनिकीय स्तर’ कहा जाता है तथा,

(ii) दूसरा वह स्तर जहाँ ध्वनियाँ परस्पर व्यतिरेक में आती है अर्थात स्वनिमिक स्तर ।

(B) परंपरागत स्वनिम विज्ञान में स्वीकृत स्वनिमिक स्तर उतना अमूूर्त नहीं होता जहाँ किसी भाषा के सभी उच्चारणात्मक अंतरों को स्पष्ट किया जा सके। अतः निष्पादन स्वनिम विज्ञान में स्वीकृत ‘व्यवस्थित स्वनिमीय स्तर’ अधिक अमूर्त स्तर है ।

(C) व्यवस्थित स्वनिमीय स्तर का संबंध मातृभाषा भाषी के मन में रहने वाले अमूर्त अभिव्यक्तियों के साथ होता है।

(D) इस आंतरिक अमूर्त स्तर की अभिव्यक्तियों को मूर्त स्वनिकीय स्तर की अभिव्यक्तियों में परिवर्तित करने वाले कुछ नियम होते हैं जिन्हें स्वनिमीय नियम कहा जाता है ।

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