प्रोक्ति (लगभग 250 – 500 शब्दों में टिप्पणी लिखिए)| IGNOU MHD – 07 NOTES

IGNOU MHD – 07 NOTES

प्रोक्ति (लगभग 250 – 500 शब्दों में टिप्पणी लिखिए |)

उत्तर : आधुनिक भाषाविज्ञान भाषा को उसकी प्राकृतिक परिवेश में देखते हैं और भाषा का प्राकृतिक स्वरूप है उसका विविध क्षेत्रों में प्रयोग। जैसे —

वार्तालाप, भाषण, निबंध, लेखन, पत्र – लेखन आदि। भाषा के प्रयोग के इन्हीं रूपों को हम प्रोक्ति कहते हैं ।

मानव एक सामाजिक प्राणी है, यह एक सर्वसम्मत सत्य है। मानव को भाषा का वरदान मिला है। भाषा समाज के प्रत्येक सदस्य को वह सामर्थ्य देती है जिसे

वह अपने विचारों, मनोभावों, कल्पनाओं आदि को दूसरे सदस्य के पास पहुचा सकता है । इसके  अतिरिक्त भाषा वह माध्यम बनती है जिससे एक पीढ़ी अपनी अर्जित ज्ञान – सम्पदा, रचना तकनीकों तथा सामाजिक मूल्यों को अपनी अगली पीढ़ी को सौंपती है और इस अर्पण – ग्रहण परंपरा से मानव – संस्कृति निरंतर प्रगतिशील बनी रहती है। इन सामाजिक अन्योन्य क्रियाओं में हुए भाषाई व्यवहार की स्वयंपूर्ण इकाई ‘प्रोक्ति’ कही जाती है ।

सामाजिक अन्योन्य क्रिया में जैसे – दो लोगों की बातचीत में दुआ – सलाम, नमस्ते, अलविदा का प्रयोग होता है, वह एक पूर्ण समाज भाषा वैज्ञानिक इकाई है – “प्रोक्ति” है। इसे हम भारतीय चिंतन का ‘वाक’ भी कह सकते हैं। अर्थात वागारंभ से वागंत तक का भाषिक व्यवहार ‘प्रोक्ति’ है।

लिखित भाषा व्यवहार में लिखित अंश का आदि अंत लेखबद्ध पूर्ण इकाई है – वह एक ‘प्रोक्ति’ है, या पूरा उपन्यास अथवा पूरी कृति या रचना भी एक ‘प्रोक्ति’ है। यहाँ तक कि हमारी पाठ्य पुस्तक, अध्याय, खंड, पैराग्राफ भी एक प्रोक्ति है।

प्रोक्ति में आकार का काई बंधन नहीं है। छोटा सा नोटिस ‘फूल तोड़ना मना है’  एक प्रोक्ति है क्योंकि संदेश – प्रेषण की दृष्टि से वह पूर्ण है, और दूसरी और ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्य भी ।

प्रोक्ति एक समाजभाषा वैज्ञानिक इकाई है, जो संप्रेषण की दृष्टि से, संदेश की पूर्णता की दृष्टि से और आशय अभिव्यक्ति की दृष्टि से अधूरी नहीं है। इस प्रोक्ति को जब भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से देखते हैं, तब वह एक वाक्य के ऊपर की व्याकरणिक संरचना है। जिसे प्रकार रूपिम शब्दों की, शब्द पदबंधों की, पदबंध  उपवाक्य की और उपवाक्य वाक्य की उत्तरोत्तर रचना करते  हैं, वैसे ही वाक्य ‘प्रोक्ति’ की रचना करते हैं। अर्थात ‘प्रोक्ति’ के संरचक  घटक ‘वाक्य’ है। संरचक वाक्य परस्पर जुड़कर जब एक संदेश कि स्वयंपूर्ण अभिव्यक्ति करते हैं, तब प्रोक्ति बनती है।

अतः भाषा के सामान्य व्यवहार के सभी संदर्भ जैसे बातचीत, एक कहानी या पत्र प्रोक्ति कहलाएंगे। इन्हें प्रोक्ति कहने का एक आधार है, जब व्यापक संदर्भ में भाषा का प्रयोग होता है। प्रोक्ति में आकार का कोई बंधन नहीं  है। प्रोक्ति के विषय में यह जाना है कि वह सामाजिक अन्योन्य क्रिया के बीच हुआ एक स्वयंपूर्ण भाषिक व्यवहार हैं।

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