IGNOU MHD 01 Notes

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MHD – 01 (हिंदी काव्य)

” कनवज्ज समय ” की विषयवस्तु :    

चन्दबरदाई  कृत पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य के आदिकाल का सर्वाधिक विख्यात , लोकप्रिय और विवादग्रस्त महाकाव्य है । कहते हैं कि इस काव्य के रचयिता चंदबरदाई अपने आश्रयदाता पृथ्वीराज के दरबारी कवि ही नहीं उनके अंतरंग मित्र भी थे । कथानक के अंतर्गत ” कैमास वध ” और   ”  कनवज्ज समय ” रासों का एक महत्वपूर्ण अंश है ।

इसमें जयचंद्र की कन्नौज यात्रा और संयोगिता के अपहरण की कथा आई है । इस प्रसंग में कवि ने श्रृंगार युद्ध और यहा तक की प्रकृति वर्णन का भी अवसर निकाल लिया है । पृथ्वी रासो में अधिकांशत: पृथ्वीराज रासो का एक चरित काव्य है , जिसमें पृथ्वीराज के विभिन्न विवाहों एवं युद्धों की ही कथा है ।तथा रासो के अंतिम अंश में पृथ्वीराज द्वारा गौरी का, शब्दभेदी बाण द्वारा वध का वर्णन है । साथ ही पृथ्वीराज की भी मृत्यु हो गई ।

(१) कथानक:

रासो में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिकता के विषय में चाहे जितना मतभेद हो , घटनाओं के उप -स्थापन का शिल्प यथार्थ – परक है , कारण यह है कि उसमें पृथ्वीराज के मन का द्वंद छिपाया नहीं गया है ।कैमास वध में कैमास पृथ्वीराज का प्रधानामात्य  और सर्वाधिक विश्वस्त मंत्री था ।

कैमास कर्णाटी नाम की दासी पर अनुरक्त था । यह समाचार मिलते ही पृथ्वीराज ने रात में ही आकर कैमास की हत्या कर दी । पृृथ्वीराज ने  चंद से कहा —- तुम क्या आकाश -पाताल की बातें कर रहे हो यह तो बताओ कि कैमास कहॉं है या मुझे हरसिद्धि देवी का वर प्राप्त है यह  कहना छोड़ दो । निकम्मे कवि काव्य रचना बंद कर दो।

(२) कनवज्ज समय:

रासों का एक महत्वपूर्ण अंश है कनवज्ज समय । पृथ्वीराज चौहान और जयचंद में बैर था ।कन्नौज जयचंद की राजधानी थी। जयचंद अपने समय में उत्तरी भारत का संभवत: सबसे बड़ा शासक था । उसकी उपाधि दल पंगुर थी । “दल – पंगुर” अर्थात ऐसा नरेश जिसकी सेना इतनी विशाल हो कि उसे प्रयाण न करना पड़े ।

जहा आक्रमण करना हो वहा तक सेना ही रहे , यानी जिसकी सेना चलती ना हो , पंगु हो । उसने सुना कि जयचंद्र ने राजसूय यज्ञ किया , जिसमें उसने पृथ्वीराज की प्रतिमा यज्ञ सभा के द्वार पर स्थापित कर दी । जयचंद की पुत्री संयोगिता ने पृथ्वीराज के रूप पराक्रम की गाथा सुन रखी थी । उसने जयमाल पृथ्वीराज के गले में डाल दी ।

जयचंद क्रोधित होकर संयोगिता को दासियों के साथ गंगा तट पर स्थित एक महल में रहने की व्यवस्था करा दी । पृथ्वीराज यह समाचार सुनकर अपमान से दग्ध हो उठा ।

साथ ही साथ उसने ह्रदय में संयोगिता के प्रति अनुराग का भाव भी अंकुरित हुआ। पृथ्वीराज अपने रानियों से आज्ञा लेकर चंदवरदाई के साथ कन्नोज जाने के लिए उद्धत हुआ । संयोगिता पृथ्वीराज से गंगा तट पर ही मिलती है ।

पृथ्वीराज संयोगिता को घोड़े पर बिठाना चाहता है । तो संयोगिता को संकोच होता है । और संयोगिता के मन में भविष्य के प्रति नारी सुलभ डर भी है कि चौहान आजीवन उसका साथ देगा या नहीं ? संयोगिता कहती  हैं — मैं पिता की सारी सेना के सामने घोड़े की पीठ पर कैसे बैठू ? पृथ्वीराज ने समझाया — मन को अब भारी मत करो ।

मैं जयचंद की समस्त सेना का संहार कर दूंगा । सुंदरी तब तुम्हें घोड़े पर बैठते समय लज्जा नहीं आएगी । इसके बाद संयोगिता कुछ सोच समझ रही थी कि पृथ्वीराज ने उसे बांह से पकड़कर घोंड़े पर बिठा लिया । संयोगिता घोड़े पर पृथ्वीराज की पीठ से सट कर बैठ गई । मानो पूर्ण चंद्रमा सूर्य के साथ जुड़कर बैठ गया हो । अंत में पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर दिल्ली पहुंचते हैं ।जहा उनका विधिवत विवाह होता है । तदुपरांत कवि उनके केली – विलास का जमकर वर्णन करता है ।

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(३) युद्ध और श्रृंगार :

रासों में प्राय: युद्ध और श्रृंगार दोनों का वर्णन साथ – साथ होता है । चंदवरदाई वीरता की अभिव्यक्ति केवल युद्ध वर्णन में ही नहीं करते । वे वीरता को आंतरिक गुण मानते हैं । श्रृंगार :   रासों का काव्योत्कर्ष श्रृंगार के क्षेत्र में वीरता से कम नहीं है।

चंद वयस्संधि वर्णन में परम निपुण है । यहा भी वे नायिका के शरीर का ही नहीं उनके मनोभावों का भी चित्रण करते हैं । चंद प्राय: पात्र के  शरीर और मन का चित्रण एक साथ कर देते हैं । यह श्रृंगार वर्णन की दृष्टि से चंद की विशेषता है 

पुराने पत्ते झड़ गए , कोमल अंकुर निकलने लगे । शैशव उतर रहा है और किशोर चढ़ रहा है । शीतल , मंद , सुगंध वायु के साथ अचानक ऋतुराज आ गया ।इस तरह श्रृंगार वर्णन का मार्मिक चित्रण हुआ है ।

(४) पात्र चित्रण :

चंद की विशेषता यह है कि वे पात्रों की दुविधा का चित्रण करना नहीं भूलते , चाहे वह व्यस्संधि नायिका की दुविदा हो , चाहे पृथ्वीराज के साथ दिल्ली जाने के लिए घोंड़े पर बैठती संयोगिता की दुविधा । माता-पिता का घर छोड़कर पृथ्वीराज से मिलने के लिए मंदिर जाने की तैयारी करती हुई शशिव्रता के मन का द्वंद दृष्टतव्य है ।

(५) प्रकृति वर्णन :

कवि प्रकृति वर्णन में सिद्धहस्त हैं । कनवज्ज समय के षट् – ऋतु का वर्णन है । वे प्रकृति का ऐसा चित्रण करते हैं कि उससे पात्रों की तत्कालीन मन स्थिति का चित्रण हो जाता है । कैमास अंधेरी रात में कर्णाती के साथ केली – विलास में निमग्न है । घोर  अंधकार है , मूसलाधार वर्षा हो रही है ।

अंधकार पूर्ण रात में पृथ्वी घनघोर वर्षा से छिन्न-भिन्न विदीर्ण हो रही है । वही मंत्री कैमास कामांध है । पृथ्वी का घनघोर वर्षा से विदीर्ण होना घोर श्रृंगार का संकेत है ।

कनवज्ज समय में अनेक मार्मिक प्रसंग आए हैं । कनवज्ज समय में वर्णित षट् – ऋतु वर्णन हिंदी साहित्य की अनुपम धरोहर है । कवि ने उस युग की समृद्ध नगरी कान्यकुब्ज के सौंदर्य का वर्णन विस्तार से किया है ।

राजा जयचंद के राज दरबार में चंदवरदाई के साथ छदम वेश में पृथ्वीराज के जाने की घटना भी नाटकीयता से भरपूर है । इसके बाद गंगा के किनारे संयोगिता और पृथ्वीराज का मिलन अद्भुत है ।

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