पर्यायता (लगभग 250 – 250 शब्दों में टिप्पणी लिखिए) | IGNOU MHD – 07 NOTES

IGNOU MHD – 07 NOTES

पर्यायता (लगभग 250 – 250 शब्दों में टिप्पणी लिखिए |)

उत्तर : पर्यायता :

“पर्यायता” नाम और – और ‘रूपोंं’ का वह संंबंध है जहां  एक ‘रूप’ के अनेक ‘नाम’ भाषाविशेष में मिलते हैं। उदाहरणार्थ हिन्दी में एक ‘रूप’ ‘चन्द्रमा’ के लिए चाँद, चंदा, चन्द्र, रजनीकर, हिमरशिम आदि अनेक ‘नाम’ मिलते हैं। ये सब नाम आपस में पर्याय है।

पर्याय का आविर्भाव:

(i) बहुभाषिकता की स्थिति:

पर्यायता की विशेषतः हिंदी पर्यायता का मुख्य स्रोत बहुभाषिकता हैं। सम्यता के आदिकाल से प्राकृतिक प्रतिकूलता के कारण झुंड के झुंड मानव – समूह  अन्यत्र अन्यभाषी प्रदेश में पहुँचते रहते थे, और विकसित सभ्यता वाले समाजों में सीमित मात्रा में ही सही लोग धार्मिक, राजनैतिक, व्यापार – वाणिज्यिक, शिक्षा एवं कला क्षेत्रों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए दूसरे देशों में निरंतर जाते थे। इस प्रकार की अन्योन्य क्रिया की स्थिति में बहुभाषिकता की स्थिति उत्पन्न होती थी। 

बहुभाषिकता की स्थिति में पहले एक रूप में एक शब्द की जरूरत होती थी, परंतु बाद में एक रूप के लिए निजी ‘नाम’ होते हुए भी आग्रह करता है कि उसका अपना ‘नाम’ चले तो बहुभाषिकता में एक ही ‘रूप’ के लिए दो ‘नाम’ हो जाते हैं। एक उसका अपना निजी नाम और दूसरा उसका प्रभावी नाम ।

हिंदी क्षेत्र में ऐसी पर्यायता प्रचुर है –  पहले मुगल आदि प्रभावी थे, और बाद में अंग्रेज आदि । हिंदी के अपने ‘नाम’ के साथ – साथ फारसी या अंग्रेजी शब्द मिलते हैं। जैसे – पवन – हवा, पुस्तक – किताब, सुंदर – खूबसूरत, लज्जा – शरम, उद्दान – गार्डन, मानचित्र – एटलस, डॉक्टर – वैद्य – हकीम आदि।

(ii) ऐतिहासिकता की स्थिति:

पर्यायता की विशेषतः हिंदी पर्यायता का एक अन्य प्रमुख स्रोत हिंदी का लंबा इतिहास है । हिंदी भाषा को विरासत में एक विशाल शब्द भंडार संस्कृत से तत्सम शब्दों के रूप में मिला है । संस्कृत के विकसित परवर्ती भाषाओं जैसे पालि, प्राकृत, अपभ्रंश से भी उसे संस्कृत के अनेक शब्द तद्भव रूप में मिले हैं । इस कारण एक ही ‘रूप’ के लिए तत्सम ‘नाम’ तद्भव  ‘नाम’ और ‘देसी’ नाम मिल सकते हैं । जैसे – मुख – मुंह, कर्ण – कान, पुष्प – फूल, विद्युत – बिजली, कृष्ण – कान्ह और किशन आदि।

(iii) विदेशी शब्दों के अनुवाद :

विदेशी शब्दों के अनुवाद के कारण भी पर्यायता आ जाती है । कभी-कभी भाषा में पहले से ही शब्द होता है, फिर भी विदेशी शब्द का नया रूपांतरण किया जाता है और पर्याय युग्म का जन्म होता है। जैसे equator के लिए विषुवत रेखा प्राचीन शब्द था, नया शब्द ‘भूमध्य रेखा’ बना ।

(iv) अशुभ या अमंगल परिहार :

यह सार्वजनिक प्रवृत्ति है कि अशुभ या अमंगल को ज्यों का त्यों अभिधा में न कहा जाए – ऐसा कहना शालीनता से परे होता है। बच्चों को ‘शू’ या एक अंगुली ऊपर उठाकर सिखाया जाता है । वयोवृद्ध मरते नहीं है – परलोक वासी होते हैं, स्वर्गवासी बनते हैं। मरण के पर्याया हैं – निधन, प्रयाण, देहांत, देहावसान आदि ।

(v) साहित्यिक लेखन में पर्याय‍ :

साहित्यिक लेखन में पर्याय शब्दों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । मानवकृत वस्तुएं तो प्रायः एक – दो प्रकार्यों के लिए बनाई जाती है, किंतु प्राकृतिक सत्ताओं के अनेक प्रकार्य – गुण होते हैं । जैसे- सूर्य हमें प्रकाश देता है, उष्णता देता हैै, चंद्रमा हमें प्रकाश देता है, शीतलता देता है।

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